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-राम पुनियानी
मानवाधिकार दिवस (10 दिसम्बर) हमारे लिए एक मौका होता है भारत में
मानवाधिकारों की स्थिति का अध्ययन करने का। मानवाधिकारों की अवधारणा, प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर
आधारित है। पिछले कई दशकों से, विशेषकर संयुक्त राष्ट्रसंघ के अस्तित्व में आने के बाद से, मानवाधिकारों को दुनिया भर
में महत्व दिया जाने लगा है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के जरिए, दुनिया के विभिन्न देशों के निवासियों के
मानवाधिकार क्या होने चाहिए और वे उन्हें उपलब्ध हों, यह कैसे सुनिश्चित किया जाए आदि जैसे प्रश्नों पर
गहराई से विचारमंथन होता आ रहा है। कई देशों, जिनमें भारत शामिल
है, ने संयुक्त
राष्ट्रष्संघ द्वारा जारी किए गए मानवाधिकार घोषणापत्रों पर हस्ताक्षर किए हैं।
भारत के इन घोषणापत्रों के हस्ताक्षारकर्ता होने के बावजूद यहां अल्पसंख्यकों के
मानवाधिकारों की स्थिति वैसी नहीं है, जैसी कि होनी चाहिए। यह साफ है कि किसी भी देश में
प्रजातंत्र की सफलता का एक मानक यह है कि वहां अल्पसंख्यकों-विशेषकर धार्मिक
अलपसंख्यकों-और समाज के अन्य कमजोर वर्गों को कितने मानवाधिकार प्राप्त हैं। इस
पैमाने पर भारत बहुत पीछे है।
अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के मूल
में है बढ़ती साम्प्रदायिक हिंसा और हमारी राजनीति में साम्प्रदायिकता की घुसपैठ।
साम्प्रदायिक हिंसा में विश्वास करने वाले तत्व हमारे समाज के विभिन्न तबकों में
घर कर गए हैं और इनके कारण अलगाववादी प्रवृत्तियों में बढ़ोत्तरी हुई है। इससे,
अंततः, धार्मिक अल्पसंख्यकों के
मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। ये सभी प्रक्रियाएं ऐसी हैं जो कि एक-दूसरे को
मजबूती देती हैं।
चूंकि साम्प्रदायिक हिंसा, साम्प्रदायिक राजनीति का सबसे दृष्टव्य हिस्सा है
इसलिए सबसे पहले हमारा ध्यान उस ओर जाना स्वाभाविक है। पिछले 60 वर्षों में साम्प्रदायिक
हिंसा में बढ़ोत्तरी हुई है और सन् 1980 के दशक में पहचान से जुड़े मुद्दों के जोर पकड़ने के साथ ही,
साम्प्रदायिक दंगों की
ज्वाला की लपटें भी और ऊँची उठने लगी हैं। शाहबानो कांड ने साम्प्रदायिक तत्वों को
अपने हाथपैर फैलाने का मौका दिया और इससे ही शुरू हुई पहचान पर आधारित राजनीति।
राम मंदिर का मुद्दा, साम्प्रदायिक तत्वों को एक मंच पर लाने में सफल रहा। इसके बाद से साम्प्रदायिक
हिंसा में भयावह वृद्धि हुई।
इस हिंसा के शुरूआती शिकार थे मुस्लिम अल्पसंख्यक।
परंतु बाद में ईसाईयों को भी निशाने पर ले लिया गया। साम्प्रदायिक हिंसा का मूल
चरित्र मुस्लिम विरोधी है, यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि साम्प्रदायिक हिंसा, जो कि आजाद भारत में सन् 1961 में जबलपुर से शुरू हुई थी, से लेकर हाल में उत्तरप्रदेश के कुछ इलाकों में हुए
दंगों तक, हिंसा में जान
गंवाने वालों में से 90 प्रतिशत मुसलमान होते हैं। सन् 2001 की जनगणना के अनुसार, कुल आबादी में उनका प्रतिशत 13.4 है। जहां तक ईसाई-विरोधी
हिंसा का सवाल है, उसने जोर पकड़ा सन् 1990 के दशक में। सन् 1999 में पास्टर ग्राहम स्टेन्स की हत्या और सन् 2008 में कंधमाल में आदिवासियों
पर हमले हुए।
हिंसा अकेले नहीं आती। उसके आगे-आगे चलती हैं निशाना
बनाए गए समुदाय के दानवीकरण की प्रक्रिया। साम्प्रदायिक हिंसा इसलिए संभव हो पाती
है क्योंकि साम्प्रदायिक ताकतें और पुलिसबल व राज्यतंत्र जुगलबंदी में काम करते
हैं। प्रशासनतंत्र और पुलिस का पूरी तरह साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है।
साम्प्रदायिक हिंसा के पीछे आती है साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया। यह भी
साम्प्रदायिक राजनीति को और मजबूती देती है। धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण से धार्मिक
अल्पसंख्यक अपने-अपने मोहल्लों में सिमट जाते हैं और इससे उनकी आर्थिक स्थिति में
और गिरावट आती है। देश के लगभग सभी बड़े शहरों में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया जारी है
और दिन-प्रतिदिन तेज होती जा रही है। इसने मुस्लिम अल्पसंख्यकों की माली हालत पर
बहुत विपरीत प्रभाव डाला है। यदि हम एक मानवाधिकार सूचकांक की कल्पना करें, तो
उसमें शामिल होंगे संबंधित समुदाय में सुरक्षा की भावना और उसके साथ बराबरी का
व्यवहार। समुदाय में रोजगार और आवश्यक आर्थिक-सामाजिक सुविधाओं की उपलब्धता की
स्थिति का भी हमें ध्यान रखना होगा।
जहां तक मुस्लिम समुदाय का सवाल है, उस पर लदा हुआ एक ऐतिहासिक
बोझ भी उसके आर्थिक विकास के रास्ते में रोड़ा है। मुसलमानों की आर्थिक बेहतरी के
लिए कोई सकारात्मक कदम न उठाए जाने के कारण वे आर्थिक क्षेत्र में हाशिए पर पटक
दिए गए हैं और धीरे-धीरे पीछे, और पीछे छूटते जा रहे हैं। यह सर्वज्ञात है कि भारत के विभाजन के समय जिन
मुसलमानों ने भारत में रहना तय किया उनमें से अधिकांश निचले सामाजिक-आर्थिक तबके
के थे। उनकी समस्या को और बढ़ाया बहुसंख्यक समुदाय द्वारा उन्हें नीची निगाहों से
देखने की प्रवृत्ति ने। उन्हें विभाजन के लिए जिम्मेदार माना जाता था। रोजगार और
आर्थिक अवसरों की उपलब्धता की दृष्टि से उन्हें समाज में उनका उचित स्थान नहीं
मिला। वे मंझधार में ही छूट गए। इसके अतिरिक्त, वे साम्प्रदायिक हिंसा का भी निशाना
बने और अंततः लक्ष्यविहीन हो भटकने लगे। राजनैतिक पार्टियों ने उनकी हालत को
नजरअंदाज किया और उनके अपने समुदाय के नेता नाकारा साबित हुए।
मुसलमानों की हालत कितनी खराब है यह सच्चर समिति और
रंगनाथ मिश्र आयोग की रपटों से पता चलता है। ये रपटें हमें बताती हैं कि विभिन्न
आर्थिक सूचकांकों पर मुसलमानों की स्थिति में तेजी से गिरावट आई है। यह सब मुस्लिम
अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है। इस समुदाय के लोगों को अपने भविष्य
से जरा भी आशा नहीं रह गई है और यही कारण है कि उन्हें शिक्षा प्राप्त करने के लिए
प्रेरित करना बहुत कठिन हो गया है। उन्हें लगता है कि वे कुछ भी कर लें, उनकी हालत में कोई
सुधार नहीं आएगा। इन परिस्थितियों यह आवश्यक
है कि राज्य उनकी बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठाए ताकि वे अपने मानवाधिकार हासिल
करने की दिशा में आगे बढ़ सकें। जब भी कोई समुदाय अपने आप में सिमटने लगता है तब आवश्यक
रूप से उसमें संकीर्ण सोच और दकियानूसीपन बढ़ता है। बढ़ता दकियानूसीपन, साम्प्रदायिक तनाव, अलगाव के भाव और
साम्प्रदायिक हिंसा को और बढ़ाता है। अगर इस दुष्चक्र को तोड़ना है तो सबसे पहले यह सुनिश्चित
किया जाना जरूरी है कि किसी भी स्थिति में साम्प्रदायिक हिंसा न हो। इस संदर्भ में
साम्प्रदायिक हिंसा निरोधक कानून और राज्य व सामाजिक संगठनों द्वारा इस समुदाय के
विरूद्ध चलाए जा रहे दुष्प्रचार का मुकाबला किया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जब तक कोई व्यक्ति या समुदाय, भौतिक रूप से स्वयं को
सुरक्षित अनुभव नहीं करता, तब तक उसकी प्रगति या समृद्धि की कोई संभावना नहीं है। भौतिक सुरक्षा, देश के प्रत्येक नागरिक का
प्रजातांत्रिक व मानव अधिकार है। धर्म-आधारित राष्ट्रवाद की विचारधारा के उदय से
कई स्थानों पर मुसलमानों को द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना दिया गया है। इस स्थिति
का एक उदाहरण है गुजरात। मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में सरकारी नीतियों और
कार्यक्रमों के जरिए मुस्लिम समुदाय पर एक संस्कृति विषेष लादी जा रही है और
उन्हें सांस्कृतिक, शैक्षणिक व आर्थिक क्षेत्रों से खदेड़ा जा रहा है।


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