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सुभाष गाताडे
स्कूल और नौकरियों में अपनी आबादी के अनुपात में बहुत कम प्रतिनिधित्व रखनेवाले अल्पसंख्यकों की तादाद क्या जेलों में आबादी के अनुपात से ज्यादा है ?
भारत में मुसलमानों के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की पड़ताल करने के लिए गठित सच्चर आयोग ने पहली दफा इस असुविधाजनक लगनेवाले सवाल को उठाया था, जिसमें बताया गया था कि जेलों में उनकी संख्या आबादी के अनुपात से कहीं दुगुनी या कहीं तिगुनी भी है। इतनी बड़ी तादाद में समुदाय विशेष के जेल की सलाखों के पीछे होने के गहरे सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ थे, जिसमें समुदाय का अधिक हाशियेकरण, गहराते पूर्वाग्रह और उसके बारे में घिसीप्िाटी बातों को मिलती मजबूती जैसे मसले शामिल थे। मसविदा रिपोर्ट के जो अंश कुछ राष्ट्रीय अखबारों में प्रकाशित हुए थे, उसमें इससे सम्बधित आंकड़े भी प्रकाशित हुए थे मगर कहां क्या हुआ कि अंतिम रिपोर्ट में यह मसला अनुल्लेखित रह गया। पिछले दिनों यह मुद्दा नए सिरे से सुर्खियों में आया जब महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक आयोग के तत्वावधान में टाटा इंस्टीटय़ूट ऑफ सोशल साइंसेज के सेन्टर फॉर क्रिमिनोलोजी एंड जस्टिस विभाग के दो विद्वानों डॉ विजय राघवन और रोशनी नायर द्वारा अध्ययन के निष्कर्ष मीडिया के एक हिस्से में प्रकाशित हुए। स्पष्ट है कि इस अध्ययन की नींव एक तरह से सच्चर आयोग की मसविदा रिपोर्ट के फॉलोअप के तौर पर पड़ी थी।
मसविदा रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख था कि महाराष्ट्र में जहां वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक मुसलमानों की आबादी 10.6 फीसद है, वहीं जेल की आबादी में उनका अनुपात 32.4 प्रतिशत है। यह रिपोर्ट महाराष्ट्र की 15 अलग-अलग जेलों में बन्द 339 मुसलमानों के साक्षात्कार पर आधारित है। मगर यह इस मसले पर राय नहीं देती कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ मामला दर्ज करते समय क्या वाकई उनके साथ भेदभाव होता है? अध्ययनकर्ताओं के मुताबिक पहले तो मंत्रालय के अधिकारी ऐसे किसी अध्ययन के लिए तैयार नहीं थे मगर अल्पसंख्यक आयोग के दबाव बनाने पर वह इसके लिए तैयार हुए। बहरहाल, अध्ययन इसी बात को सामने लाता है कि चेतन-अचेतन तौर पर समुदाय विशेष कहीं न कहीं संस्थागत भेदभाव का शिकार हो रहा है। उदाहरण के लिए अध्ययनकर्ताओं को दिए साक्षात्कार में तीस फीसद बंदियों ने बताया कि गिरफ्तारी के वक्त उन्हें अपने रिश्तेदारों से बात नहीं करने दी गई जो अभियुक्तों के जनतांत्रिक अधिकारों का सरासर उल्लंघन था।
विगत कुछ सालों में अखबारों में प्रकाशित चन्द रिपोटरें को पलटें तो यह बात अधिक पुष्ट हो सकती है कि जेल में बंद अल्पसंख्यक वाकई कई स्तरों पर प्रताड़ित होते हैं। उदाहरण के लिए तीन साल पहले (मार्च 2009) गुजरात की साबरमती जेल से 250 से अधिक कैदियों की भूख हड़ताल की खबर सुर्खियां बनी थीं। बताया जाता है कि जेल अधीक्षक द्वारा कथित तौर पर बंदियों के अधिकारों की मनमाने ढंग से कटौती करवाने के खिलाफ जिस दिन गुजरात हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी, उसी दिन शाम को बंदियों पर हमला हुआ था। वे सभी जो गुजरात में जेल के अंदर मानवाधिकार की स्थितियों पर निगाह रखे हुए हैं, बता सकते हैं कि उपरोक्त जेल के हिसाब से ऐसी घटनाओं में अनहोनी जैसी कोई बात नहीं थी। आठ साल पहले भी वडोदरा जेल में अल्पसंख्यक समुदाय के कैदियों पर लाठीचार्ज की घटना राष्ट्रीय फलक पर सुर्खियां बनी थीं और उसके कुछ दिन पहले साबरमती जेल में कैदियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया था, जिसमें छह कैदियों को चोटें आई। उल्लेखनीय है कि इन कैदियों पर हरेन पंड्या की हत्या और गोधरा कांड के मामले दर्ज थे।
कुछ वर्ष पूर्व भारत के मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों की ओर से तिहाड़ जेल के अधिकारियों की साम्प्रदायिक नीतियों की जांच करने की दरखास्त ने भारतीय जेलों में प्रशासन के एकांगी रुख के चलते साम्प्रदायिक सद्भाव की बिगड़ती स्थिति तथा कैदियों के मानवाधिकार के प्रश्न को लेकर नई बहस को जन्म दिया था। उपरोक्त शिकायत में प्रख्यात समाजवादी नेता सुरेन्द्र मोहन ने जेल अधिकारियों द्वारा पूर्वाग्रहों से लैस होकर अपनाई जा रही कथित साम्प्रदायिक नीतियों का उल्लेख करते हुए तिहाड़ जेल की नारकीय परिस्थितियों के बारे में जांच शुरू करने का आग्रह किया था। ज्ञापन के मुताबिक आम तौर पर मुस्लिम बंदियों तथा विशेषकर कश्मीरी बंदियों के साथ हो रहा भेदभाव अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के बुनियादी उसूलों के खिलाफ माना जाता है। इसी बुनियाद पर उसने आयोग से मांग की थी कि वह जेल में मानवाधिकारों की जांच के लिए कमेटी बना दे और अति सुरक्षित सेल के बंदियों की समस्याओं के बारे में रपट तैयार करे। कानून की साधारण किताब भी बता सकती है कि जेलों का निर्माण राज्य की निगाह में अपराधी साबित किए गए व्यक्तियों के सुधार के लिए हुआ है। यह उम्मीद की जाती है कि वे लोग जो किन्हीं कारणों से जेलों में अपने किए की सजा भुगत रहे हैं, जेल से जब बाहर आएंगे तो एक बेहतर इंसान के तौर पर समाज का हिस्सा बनेंगे लेकिन दूसरी तरफ हकीकत बताती है कि अपराधी, पुलिस या सियासतदानों की आपसी सांठगांठ का मामला खुला रहस्य है तथा साधारण कैदियों पर रोज ब रोज ढाया जानेवाला कहर भी किसी से छिपा नहीं है। टाटा इंस्टीटय़ूट आफ सोशल साइंसेज द्वारा किए अध्ययन में साजिद (बदला हुआ नाम) का भी जिक्र है। उसने अध्ययनकर्ताओं को बताया कि मैं एक नई शुरुआत करना चाहता हूं। हर बार जब मैं कोई काम करने लगता हूं तो पुलिस मुझे किसी न किसी मामले में फंसा कर अंदर कर देती है। वे मुझसे पैसा मांगते हैं और जो पैसा देने की स्थिति में होते हैं, उन्हें छोड़ दिया जाता है। पुलिस बहुत ताकतवर है और वह कुछ भी कर सकती है। सवाल उठता है कि धर्मनिरपेक्षता के रास्ते पर चलने के लिए संकल्पबद्ध इस मुल्क में साजिद जैसों के लिए नई शुरुआत आखिर कब मुमकिन होगी ?


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