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नई दिल्ली (एजेंसियां)। देश के कई सामाजिक एवं अल्पसंख्यक संगठनों ने सांप्रदायिक एवं सुनियोजित हिंसा विरोधी विधेयक के मसौदे को अस्वीकार करते हुए कहा है कि इसमें स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही तय करने के प्रावधान शामिल करने सहित कई बदलाव किए जाने की जरूरत है। दिल्ली में गैर सरकारी संगठन ‘अनहद’ के तत्वाधान में इस विधेयक पर चर्चा की गई। इसमें राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की ओर से तैयार विधेयक के मसौदे में कई ‘आवश्यक संशोधन’ सुझाए गए हैं। इस बैठक में अनहद की संस्थापक और सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी, जमीयत उलेमा-ए-हिंद के नियाज फारूकी, राष्ट्रीय एकता परिषद के सदस्य जॉन दयाल, न्यायामूर्ति राजेंद्र सच्चर और कुछ अन्य सामाजिक संगठनों के लोग मौजूद थे। शबनम ने कहा, ‘ देश में सांप्रदायिक हिंसा पर काबू करने के लिए जल्द एक सख्त कानून बनना चाहिए। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की ओर से तैयार विधेयक प्रभावी नहीं है। इसे नए ढंग से तैयार किया जाना चाहिए।’
वर्ष 2010 में सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए एक समूह का गठन किया था। इसके बाद सांप्रदायिक एवं सुनियोजित हिंसा विरोध विधेयक-2011 का मसौदा तैयार हुआ। इस बैठक के बाद इन संगठनों- कार्यकर्ताओं ने 10 सूत्री संशोधनों का प्रस्ताव रखा है। उनका कहना है कि इन संशोधनों के बाद यह विधेयक कारगार साबित होगा। सामाजिक संगठनों की ओर से सुझाए गए संशोधनों में स्थानीय अधिकारियों की जवाबदेही तय करना, गवाहों और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, उचित मुआवजे का प्रावधान करना तथा प्रशासनिक अधिकारियों के अधिकारों के बेजा इस्तेमाल को रोकने की उचित व्यवस्था किया जाना शामिल है। वैसे इस विधेयक का मसौदा सामने आने के बाद से भाजपा और कई हिंदू संगठनों ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई है। उन्होंने इसे ‘बहुसंख्यक विरोधी’ बताया है।
सामाजिक संगठनों का तर्क, स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही तय करने सहित कई बदलाव किए जाने की जरूरत है
http://rashtriyasahara.samaylive.com 22 April 2012


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