Wednesday, April 15, 2015

भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ भीमराव आंबेडकर

उपासना बेहार
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भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकारअर्थशास्त्री,समाजसुधारक,दार्शनिक डॉ॰ भीमराव रामजी आंबेडकर का जन्म 14अप्रैल 1891 को मऊ में हुआ था। वे रामजीमालोजी सकपाल और भीमाबाई की 14 वीं संतान थे। ये हिंदू महार जाति से थेजो अछूत कहे जाते थे। एक अछूत परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें सारा जीवन भेदभाव और अपमान सहना पड़ा। आंबेडकर के पूर्वज ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और उनके पिता मऊ छावनी में थे। इनके पिता ने मराठी और अंग्रेजी में डिग्री प्राप्त की थी। वे षिक्षा के महत्व को अच्छी तरह से समझते थे इसी कारण वे अपने बच्चों को हमेशा पढने और कड़ी मेहनत करने के लिये प्रोत्साहित किया करते थे। लेकिन अछूत जाति का होने का कारण इनके साथ स्कूल में भेदभाव होता था। इन्हें अन्य बच्चों से अलग बिठाया जाता था और अध्यापक उन पर ध्यान भी नही देते थे। इनको कक्षा के अन्दर बैठने की भी अनुमति नहीं थी। आंबेडकर का सरनेम सकपाल था जिसे बाद में हटा कर अपने गुरु महादेव अम्बेडकर के अम्बेडकर को जोड़ लिया। इन्हें बाबा साहब भी कहा जाता था। अम्बेडकर साहेब का परिवार बाद में मुम्बई आ गया। वहॉ वे गवर्न्मेंट हाई स्कूल के पहले अछूत छात्र थे।

वहॉ भी उनके साथ भेदभाव होता रहा। 1907 में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद उन्होनें कॉलेज की पढ़ाई के लिए बंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और देष में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अछूत बन गये। इनकी काबिलयत देख कर बड़ौदा के गायकवाड़ शासक सहयाजी राव तृतीय ने अमेरिका में उच्च अध्ययन के लिये इन्हें वजीफा दिया। इन्होनें राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में अपनी डिग्री प्राप्त की। 1916 में उनके शोध के लिए पी. एच.डी. से सम्मानित किया गया। इस शोध को उन्होंने पुस्तक ‘‘इवोल्युशन ऑफ प्रोविनिशअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया’’ के रूप में प्रकाशित कियाआगे चल कर वकालत की पढ़ाई की और ब्रिटिश बार में बैरिस्टर के रूप में प्रवेश पाया। दलित अधिकारों को लेकर उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया और संगठन भी बनाये जिनके मुख्य उद्देष्य भारतीय दलितों के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत करना था।

बाबा साहेब ने 1920 में बंबई में साप्ताहिक मूकनायक का प्रकाषन किया। बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना सारा जीवन हिंदू धर्म में बनायी चतुवर्ण प्रणाली और जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। वे चतुवणर््ा व्यवस्था के खिलाफ थे। इसे वे शोषणकारी मानते थे। उन्होनें दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका और आरक्षण की मांग की थी। बाबा साहेब षिक्षा को हमेषा प्रमुखता देते थेउनका मानना था कि षिक्षा ही दलितों पर होने वाले अत्याचार का तोड़ है। इसकी कारण उन्होेनें नारा दिया था ‘‘शिक्षित बनोसंगठित रहोसंघर्ष करो’’। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की थी जिसका प्रमुख उद्देष्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। उन्होंने आंदोलनों के माध्यम से अछूतों को सार्वजनिक पेयजल से पानी लेनेहिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया। उन्होंने इसके लिए महाड सत्याग्रह किया। डॉ. अम्बेडकर 1926 में बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बनेसन 1927 में उन्होनें छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला लियाइसी साल उन्होंने अपनी दूसरी पत्रिका बहिष्कृत भारत भी शुरू की।

वे राजनीतिक दलों के जाति व्यवस्था को खत्म करने के प्रति उदासीनता को लेकर खिन्न थेये दल देष की आजादी की बातेें तो करती थी लेकिन जाति व्यवस्था के उन्मूलन को लेकर कोई बात नही होती थीदलों का समाज में व्याप्त इस कुरुति के प्रति रवैया उदासीन ही रहातब अंम्बेडकर साहब ने अगस्त, 1930 को एक सम्मेलन के दौरान कहा था कि ‘‘हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और राजनीतिक शक्ति शोषितों की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती,उनका उद्धार समाज मंे उनका उचित स्थान पाने मे निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा,उनको शिक्षित होना चाहिए।’’ अम्बेडकर धीरे धीरे दलित समुदाय के नेता के रुप में उभरने लगेउनके प्रति इस समुदाय का जन समर्थन को देखते हुए 1931 मंे लंदन में हुए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। जहॉ पर उन्होेनें अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की बात उठाई और सम्मेलन में इस पर बहुत बहसबाजी हुई। तब 1932 में ब्रिटिश सरकार ने अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की। लेकिन गांधीजी ने इसका विरोध किया और वे उस समय पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में बंद थे वही उन्होेनें आमरण अनशन शुरु कर दिया। भारी दबाव के चलते अंबेडकर को पृथक निर्वाचिका की माँग वापस लेनी पड़ी। लेकिन इसके बदले अछूतों को सीटों के आरक्षणमंदिरों में प्रवेशपूजा का अधिकार एवं छूआ-छूत खत्म करने की बात मान ली गयी।

1936 में अम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की जिसने 1937 में हुए केन्द्रीय विधान सभा के चुनावों मे 15सीटें जीती थी। वे रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे। इसी साल उन्होंने अपनी पुस्तक ‘‘जाति के विनाश’’ प्रकाशित की जो उनके न्यूयॉर्क मे लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी। अपनी पुस्तक शुद्र कौन थेके द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के बारे में लिखा है और इस व्यवस्था में सबसे नीचे क्रम में स्थित शुद्रों के बारे में व्याख्या की है। अम्बेडकर ने अपने जीविन काल में विभिन्न विषयों पर अनेकों किताबें लिखी हैं जो आज भी लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत है। भारत की स्वतंत्रता के बाद अम्बेडकर को कानून मंत्री बनाया गया, 29 अगस्त 1947 को अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए गठित संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। देष के संविधान में सभी नागरिकों को संवैधानिक गारंटी के साथ साथ सभी नागरिकों को स्वतंत्रतायें जैसे धार्मिक स्वतंत्रताअस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया।

अम्बेडकर साहब ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों कीअनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए नौकरियों में आरक्षण प्रणाली की वकालत की। 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अम्बेडकर ने कहा ‘‘मैं महसूस करता हूं कि संविधानसाध्य हैयह लचीला है पर साथ ही यह इतना मजबूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव मेंमैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अर्धम था।’’ आधुनिक भारत के महानतम समाज सुधारक डॉ. अम्बेडकर ने महिलाओं की स्थिति सुधारने और उनके प्रति होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए 1951 में हिन्दू कोड बिल के मसौदे में उत्तराधिकारविवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता को शामिल करने की मांग की थी। लेकिन इसको लेकर संसद में बहुत बहस हुई और इसे पास नही होने दिया जिसके चलते उन्होनें मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया 1952 मंे वे राज्य सभा के सदस्य मनोनित हुए और अपनी मृत्यु यानी दिसंबर 1956 (महापरिनिर्वाण) तक वे इस सदन के सदस्य रहे। डॉ. अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और 1955 में उन्होने भारतीय बुद्ध महासभा या बौद्ध सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के साथ बौद्व धर्म ग्रहण किया। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। कई सार्वजनिक संस्थान का नाम उनके सम्मान में उनके नाम पर रखा गया है।

डॉ. अम्बेडकर ने बचपन से ही अछूत होने का दर्द भोगा थाकदम कदम पर उन्हें उनकी जाति के कारण अपमान सहना पड़ता था। वे नही चाहते थे कि इस तरह के तिरस्कार इस समुदाय के लोगों के साथ हो। वो चाहते थे कि सभी को एक इंसान के तौर पर देखा जाये। ना केवल दलितों के उत्थान बल्कि हर वंचित तबकों जैसे महिलाओंको भी उनका अधिकार और बराबरी दिलाने के लिये सतत संघर्षशील रहे। वे एक प्रगतिशील व मानवीय समाज की कल्पना करते थे। उन्होनें कहा था ’’मुझे अच्छा नही लगता जब कुछ लोग कहते हैं हम पहले भारतीय हैं बाद में हिन्दू या मुसलमानमुझे यह स्वीकार नही है। धर्मसंस्कृतिभाषा आदि की प्रतिस्पर्धा निष्ठा के साथ रहते हुये भारतीयता के प्रति निष्ठा नही पनप सकती। मैं चाहता हूं कि लोग पहले भी भारतीय हों और अंत तक भारतीय रहे,भारतीय के अलावा कुछ नहीं।’’ विंडबंना यह है कि जिन डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपना पूरा जीवन दलित,महिलाओंवंचित तबकों के अधिकारों के लिए संधर्ष करते हुए बीता दिया और संविधान में इनके हक के लिए प्रावधान कियेवे आज केवल दलित के ही नेता बनकर रह गए हैं। यह ओर दुख की बात है कि बाबा साहेब को धीरे धीरे भगवान बनाया जा रहा है। जगह जगह उनकी मूर्तीयॉ लगा कर पूजा की जा रही है जबकि वे स्वंय मूर्तीपूजा के सख्त खिलाफ थे। आज आवष्यकता है उनके विचारों को समझने और उस पर अमल करने की। उनके दिये हुए संदेष‘‘शिक्षित बनोसंगठित रहोसंघर्ष करो’’ को आत्मसात करने की है।

14 April 2015, Himachal   Dastak


Wednesday, February 18, 2015

बाल विवाह को अभिशप्त लड़कियां

उपासना बेहार

2 February 2015, DNA


‘‘मैं अभी बहुत पढ़ना चाहती हूँ लेकिन मेरे घर वाले मेरी शादी जबरदस्ती करवा रहे थे। शादी रुक जाने से बहुत खुश हूँ। अब मैं फिर से स्कूल जा पाऊॅगी और अपने मां पिता को कुछ बन कर दिखाऊंगी।’’ ये कहना था 13 साल की तनु का जिसका बाल विवाह होने जा रहा था और प्रशासन की मुस्तैदी से यह विवाह रुक गया। मध्यप्रदेश के उज्जैन के जमुनिया खुर्द गाँव की 13 साल की सोनू और तनु के विवाह की तैयारियां चल रही थी। जिसे प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद रदद् किया गया। यह घटना उसी 24 जनवरी के चंद रोज पहले हुआ है जिस दिन को पूरा देश “नेशनल गर्ल चाइल्ड़ डे” के रुप में मनाता है।

देश और प्रदेश में ऐसी हजारों तनु और सोनू जैसी बच्चियां हैं जो पढ़ना चाहती थी, कुछ बनना चाहती थी लेकिन उन सब की आकाक्षांए और अरमान बाल विवाह की भेटं चढ़ गयी। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का ऐसा छठा देश हैजहां बाल विवाह का प्रचलन सबसे ज्यादा है। भारत में 20 से 49 साल की उम्र की करीब 27 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं जिनकी शादी 15 से 18 साल की उम्र के बीच हुई है। जुलाई 2014 में यूनिसेफ द्वारा एंडिग चाइल्ड मैरिजः प्रोग्रेस एंड प्रास्पेक्ट्स’ शीर्षक से बाल-विवाह से संबंधित एक रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 720 मिलियन महिलाएं ऐसी हैंजिनकी शादी 18 साल या इससे कम उम्र में हो गई है। विश्व की कुल बालिका बधु की एक तिहाई बालिका बधू भारत में पाई जाती है अर्थात प्रत्येक 3 में से 1 बालिका बधू भारतीय है।

इसी प्रकार वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार मध्यप्रदेश में वर्ष 2012-13 में वर्ष 2011-12 की तुलना में अधिक बाल विवाह हुए हैं। प्रदेश में लड़कियों के बाल विवाह की दर पिछले वर्ष की अपेक्षा वर्ष 2012-13 में 20 जिलों में बढ़ी है जिसमें सबसे ज्यादा झाबुआदूसरे स्थान पर शाजापुर तथा तीसरे स्थान पर राजगढ़ है। वैसे प्रदेश में बाल विवाह लड़कियों में लड़कों की तुलना में कम रही हैलेकिन पिछले वर्ष 2011-12 की तुलना में बालिका विवाह 0.2 फीसदी की वृद्धि हुई है।

अगर लड़कों के बाल विवाह को देखें तो उनके बाल विवाह के जिलों में भी बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष 2012-13 में 21.3 फीसदी लड़कों के विवाह 21 वर्ष से कम उम्र में हुए हैजबकि पिछले वर्ष यह दर 18.3 फीसदी रही। वर्ष 2012-13 में 35 जिलों में लड़कों के बाल विवाह बढ़े हैं और इसमें 10 फीसदी वृद्धि की दर से झाबुआ प्रथम स्थान पर हैवहीं शाजापुर 9.6 फीसदी दर के साथ दूसरे और टीकमगढ़ 42.7 के साथ तीसरे पर है। इसी तरह इंदौरभोपाल और जबलपुर जैसे शहर भी बाल विवाह वृद्धि दर से अछूते नहीं है।

बाल विवाह बाल अधिकारों का उल्लंघन है। लिंगभेदअशिक्षाअज्ञानताअसुरक्षाधार्मिक-सामाजिक मान्यताएँरीति-रिवाज,परम्पराऐंलड़कियों को कमतर समझना,उन्हें आर्थिक बोझ माननाइत्यादि प्रमुख कारण है। समाज की यह सोच भी कि लड़कीयों की कम उम्र में शादी कर देने से वे दूसरे घर में जल्दी सामंजस्यता बिठा लेती हैंयह भी बाल विवाह के अनेक कारणों में से एक है।

जिन बच्चियों का बाल विवाह होता है उनका शारीरिकमानसिकसामाजिक व शैक्षणिक विकास सही तरिके से नही हो पाता है। कम उम्र में शादी होने से उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने के,स्वास्थ्य ,पोषणशिक्षा के अधिकार से महरुम होना पड़ता है और वे हिंसादुव्र्यवहारशोषणयौन शोषण की षिकार हो जाती हैं। बाल विवाह के कारण बच्चियां कम उम्र में गर्भवती हो जाती हैं जिससे उनमें स्वास्थ्य समस्याएं होने की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है और इसके कारण उनकी मृत्युगर्भपात में वृद्धिकुपोषित बच्चों का जन्ममाता में कुपोषणखून की कमी होनाशिशु मृत्यु दरमाता में प्रजनन मार्ग संक्रमण यौन संचरित बीमारियां बढती हैं। कच्ची उम्र में माँ बनने वाली ये बालिकाएं न तो परिवार नियोजन के प्रति सजग होती हैं और न ही नवजात शिशुओं के उचित पालन पोषण में दक्ष होती हैं इस कारण बच्चों की सही देखभाल नही हो पाती और बच्चे ताउम्र कमजोर रहते हैं। अध्ययनों से यह सिद्ध हो चुका है कि 15 वर्ष की उम्र में माँ बनने से मातृ मृत्यु की संभावना 20 वर्ष की उम्र में माँ बनने से पांच गुना अधिक होती है।

कम उम्र में शादी करने से लड़कियां शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है। अनपढ़ या कम पढ़ी लिखी होने के कारण वे अपने घर में बहुत ज्यादा आर्थिक सहयोग नही कर पाती हैं और गरीबी निरंतर बनी रहती है। इसके अलावा वे अशिक्षित होने के कारण अपने बच्चों को भी शिक्षित नहीं कर पातीं। यदि विवाह के पश्चात् पति कि मौत हो जाए तो उसे छोटी उम्र से ही विधवा का जीवन जीना पड़ता है। इस प्रकार से बाल विवाह लड़की को लिंगभेदबीमारीअशिक्षा एवं गरीबी के भंवरजाल में फंसा देता है और एक बार बच्ची इस जाल में फंस जाये तो उससे निकलना मुष्किल हो जाता है। कुल मिलाकर बाल विवाह का दुष्परिणाम जीवन भर सबसे ज्यादा बालिका बधू को भोगना पड़ता है।

बाल विवाह की कुरीति को रोकने के लिए 1928 में शारदा एक्ट बनाया गया था। इस एक्ट के मुताबिक नाबालिग लड़के और लड़कियों का विवाह करने पर जुर्माना और कैद हो सकती थी। आजादी के बाद से लेकर आजतक इस एक्ट में कई संशोधन किए गए है। सन् 1978 में इसमें संशोधन कर लडकी की उम्र शादी के वक्त 15 से बढ़ाकर 18 साल और लड़के की उम्र 18 से बढकर 21 साल कर दी गई थी। बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006’ की धारा 9 एवं 10 के तहत् बाल विवाह के आयोजन पर दो वर्ष तक का कठोर कारावास एवं एक लाख रूपए जुर्माना या दोनों से दंडित करने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा बाल विवाह कराने वाले अभिभावकरिश्तेदारविवाह कराने वाला पंडितकाजी को भी तीन महीने तक की कैद और जुर्माना हो सकता है। बाल विवाह की शिकायत कोई भी व्यक्ति निकटतम थाने में कर सकता है। अगर बाल विवाह हो जाता है तब किसी भी बालक या बालिका की आनिच्छा होने पर उसे न्यायालय द्वारा वयस्क होने के दो साल के अंदर अवैध घोषित करवाया जा सकता है।  

देश में बाल विवाह के खिलाफ कानून बने हैं और समय के अनुसार उसमें लगातार संशोधन कर उसे ओर प्रभावशाली बनाया गया है फिर भी बाल विवाह लगातार हो रहे हैं। अगर सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद देश में बाल विवाह जैसी कुप्रथा का अंत नही हो पा रहा हैतो इस असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि बालविवाह एक सामाजिक समस्या है और इसका निदान सामाजिक जागरुकता से ही सम्भव हो सकेगा। केवल कानून बनाने से यह कुरीति खत्म नही होने वाली है।


अगर इस कुप्रथा को जड़ से खत्म करना है तो इसके लिए समाज को ही आगे आना होगा तथा बालिकाओं के पोषणस्वास्थ्यसुरक्षा और शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करना होगा। समाज में शिक्षा को बढ़ावा देना होगा। अभिभावकों को बाल विवाह के दुष्परिणामों के प्रति जागरुक करना होगा। सरकार को भी बाल विवाह के विरुध बने कानून का जोरदार ढंग से प्रचार-प्रसार तथा कानून का कड़ाई से पालन करना होगा। बाल विवाह प्रथा के खिलाफ समाज में जोरदार अभियान चलाना होगा। साथ ही साथ सरकार को विभिन्न रोजगार के कार्यक्रम भी चलाना होगा ताकि गरीब परिवार गरीबी की जकड़ से मुक्त हो सकें और इन परिवारों की बच्चियां बाल विवाह का निशाना न बन पाएं।

5 February 2015, Kalptaru Express